नमस्ते जी !!!      अब  free shipping का लाभ उठायें , आज ही अपनी मनपसंद पुस्तकें मंगवाएं  9314394421

Cart

Cart

Your Cart is Empty

Back To Shop

Category: महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती

Showing 1–36 of 55 results

  • नमस्ते जी !!! अब आप घर बैठे सत्यार्थ प्रकाश पुस्तक बिल्कुल free भी प्राप्त कर सकते हैं संपर्क करें 9314394421

    Sold By : The Rishi Mission Trust
    Add to cart
  • वैदिक पुस्तकालय अजमेर द्वारा महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित एक कालजयी महान ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश का यह 41 वां  संस्करण है , जिसका  लागत मूल्य सिर्फ 70/- रु. है

    इस संस्करण के सम्बन्ध में

    इस संस्करण को शुद्ध , सुन्दर और प्रामाणिक बनाने के लिये आर्य जगत के शोध विद्वान पंजाब विश्वविद्यालय के रसायन शास्त्र के पूर्व विभागाध्यक्ष ऋषि में अनन्य निष्ठा रखने वाले डॉ रामप्रकाश जी तथा आर्ष साहित्य और ऋषि कार्य के लिए समर्पित योग्य विद्वान् श्री विरजानंद जी दैवकरणी ने जो परिश्रम किया है उसका मूल्याङ्कन परिश्रमी विद्वान् ही कर सकता है आप दोनों ने छ: मास से अधिक समय लगाकर सम्पूर्ण ग्रंथ का दोनों पांडुलिपियों और सत्यार्थप्रकाश के द्वितीय संस्करण से मिलान करने का कठिन कार्य संपन्न किया है, साथ ही आर्यजगत के प्रसिद्ध शोध विद्वान् डॉ सुरेन्द्र कुमार तथा श्री मोहन चन्द जी (अजमेर ) के परामर्श एवं सुझाव इस कार्य में पर्याप्त सहायक रहे हैं

    आप से निवेदन है की आप के पास किसी भी प्रकाशन की सत्यार्थ प्रकाश उपलब्ध हो फिर भी आप इसे तुलनात्मक अध्ययन के किये अवश्य पढ़ें

    संशय निवारण वा ऑडियो प्राप्त करने  के लिये कोल करें 9314394421

    Sold By : The Rishi Mission Trust
    Add to cart
  • “वेदों का प्रवेश द्वार ऋषि दयानन्द का ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ग्रन्थ”

    वेदों का महत्व मनुष्य-जीवन के लिये सर्वाधिक है। वेद परमात्मा की शाश्वत् वाणी है। यह वाणी ज्ञानयुक्त वाणी है
    जो मनुष्य जीवन की सर्वांगीण उन्नति का मार्गदर्शन करती है। वेदों के मर्मज्ञ विद्वान ऋषि
    दयानन्द ने कहा है कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है और इसका पढ़ना-पढ़ाना तथा
    सुनना व सुनाना सब आर्यों अर्थात् मनुष्यों का परम-धर्म है। वेदों का अध्ययन करने से मनुष्य
    की नास्तिकता दूर होती है। वेदाध्ययन से यह एक प्रमुख लाभ होता है। वेदों का अध्ययन करने
    से ईश्वर व आत्मा सहित प्रकृति के सत्यस्वरूप का ज्ञान भी होता है। यह ज्ञान मत-मतान्तरों
    के ग्रन्थों व इतर साहित्य को पढ़ने से नहीं होता। वेद संसार का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है।
    परमात्मा ने वेदों का ज्ञान अमैथुनी सृष्टि के ऋषियों व मनुष्यों को प्रदान किया था। सृष्टि को
    बने व मानपव उत्पत्ति को 1.96 अरब वर्षों से अधिक समय हो चुका है। इतना पुराना ज्ञान हमें
    पूर्ण सुरक्षित रूप में प्राप्त हुआ है, इसके लिये हम ईश्वर, ऋषियों व वेदपाठी ब्राह्मणों के
    आभारी हैं। ईश्वर की इस देन के लिये उसका कोटिशः धन्यवाद है। ऋषि दयानन्द (1825-
    1883) के समय में वेद विलुप्त हो चुके थे। वेदों के सत्य अर्थों का किसी विद्वान को निश्चयात्मक ज्ञान नहीं था। उनके पूर्ववर्ती
    किसी आचार्य के वेद के सत्य अर्थों से युक्त ग्रन्थ भी कहीं उपलब्ध नहीं होते थे। संस्कृत के कुछ व्याकरण ग्रन्थ जिन्हें वेदांग
    कहा जाता है, उपलब्ध थे। इन में शिक्षा, अष्टाध्यायी, महाभाष्य, निरुक्त आदि ग्रन्थ उपलब्ध थे। ऋषि दयानन्द ने इन
    वेदांगों के अध्ययन सहित अपनी योग व समाधि से प्राप्त शक्तियों के आधार पर वेदों को प्राप्त कर उसके प्रत्येक मन्त्र के अर्थ
    को समझा था और उस ज्ञान में विद्यमान दिव्यता एवं सृष्टि में घट रहे ज्ञान व विज्ञान के उसके सर्वथा अनुकूल पाकर उस
    वेदज्ञान का अपने विद्यागुरु की आज्ञा व प्रेरणा से देश व समाज में प्रचार किया। ऋषि दयानन्द ने सायण एवं महीधर के
    वेदभाष्य का अध्ययन कर उनके मिथ्यार्थों का भी अनुसंधान किया था और प्राचीन ऋषि परम्परा के अन्तर्गत महर्षि यास्क,
    ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद आदि ग्रन्थों के अनुरूप वेदमन्त्रों के यथार्थ अर्थ किये थे। वेदों का अध्ययन मनुष्य के
    आध्यात्मिक एवं सामाजिक ज्ञान सहित सभी प्रकार के ज्ञान में वृद्धि करता है। जिन व्यक्तियों को महर्षि दयानन्द के वेदों के
    पोषक सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि ग्रन्थों को देखने व अध्ययन करने का
    अवसर मिला है वह वस्तुतः सौभाग्यशाली हैं। हम समझते हैं कि ऐसा करने से उनका इहलोक एवं परलोक दोनों सुधरे हैं। जिन
    बन्धुओं को वेद पढ़ने का अवसर नहीं मिला है वह वेदों की भूमिका स्वरूप ऋषि प्रणीत सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका,
    संस्कारविधि एवं आर्याभिविनय आदि का अध्ययन कर उनके वेदभाष्य का अध्ययन करें तो उन्हें वेदार्थ का बोध हो सकता है।
    इससे वेदाध्यायी की अविद्या का नाश होकर विद्या का लाभ प्राप्त होगा। जिस प्रकार किसी पदार्थ का स्वाद उसे खाकर व
    चखने पर ही ज्ञात होता है इसी प्रकार वेदों का महत्व व लाभ वेदों का अध्ययन कर ही जाना व अनुभव किया जा सकता है।
    महर्षि दयानन्द अपने विद्या गुरु विरजानन्द सरस्वती, मथुरा से विद्या प्राप्त कर उनकी प्रेरणा से अज्ञान के
    निवारण एवं ज्ञान के प्रसार के कार्य में प्रवृत्त हुए थे। उनके गुरु ने उन्हें बताया था कि संसार में अल्पज्ञ मनुष्यों द्वारा रचित
    ग्रन्थ अविद्या से युक्त हैं तथा पूर्ण विद्वान योगी व ऋषियों के वेदानुकूल ग्रन्थ ही निर्दोष एवं पठनीय हैं। अतः वेदाध्ययन में
    सहायता के लिये ही ऋषि ने पहले सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ लिखा और वेदभाष्य के कार्य में प्रवृत्त होने के अवसर पर उन्होंने चारों
    वेदों की भूमिका के रूप में ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ ग्रन्थ की रचना की। यह ग्रन्थ वर्तमान में आसानी से सुलभ हो जाता है।
    वेदों पर इतना महत्वपूर्ण ग्रन्थ इससे पूर्व कहीं किसी ने नहीं लिखा। जर्मन मूल के विदेशी विद्वान प्रो0 फ्रेडरिच मैक्समूलर ने
    भी ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का अध्ययन करने के बाद लिखा कि वैदिक साहित्य का आरम्भ ऋग्वेद से होता है और ऋषि

    2

    दयानन्द की ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पर समाप्त होता है। यह ऋषि दयानन्द जी की विद्या का जादू है जो प्रो0 मैक्समूलर के
    सिर पर चढ़कर बोला है। हमें ऋषि के ग्रन्थों को पढ़ने का अवसर मिला है। अपने अल्पज्ञान के आधार पर हमें लगता है कि
    ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का अध्ययन कर लेने पर मनुष्य वेद विषयक प्रायः सभी मान्यताओं एवं सिद्धान्तों से परिचित हो
    जाता है। इसके बाद वेद का अध्ययन एक प्रकार से भूमिका ग्रन्थ में दिये गये वैदिक सिद्धान्तों की व्याख्या है। हम जितना
    अधिक भूमिका ग्रन्थ का अध्ययन करेंगे उतना ही ईश्वर व आत्मा के विषय में हमारे ज्ञान में वृद्धि होगी और हमारी अविद्या
    दूर होगी। हमें भूमिका ग्रन्थ के अध्ययन से ईश्वरोपासना की प्रेरणा मिलेगी और इसके साथ ही वेदाध्ययन की प्रवृत्ति उत्पन्न
    होकर वेदानुसार आचरण करने का स्वभाव भी स्वतः बनेगा। ऋषि दयानन्द सहित उनके सभी प्रमुख शिष्यों स्वामी
    श्रद्धानन्द, पं0 लेखराम, पं0 गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज, स्वामी दर्शनानन्द, पं0 चमूपति जी आदि सभी ने वेदाध्ययन
    किया और इसके परिणामस्वरूप उनका आचरण व स्वभाव वेदानुकूल बना। इसे ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों के अध्ययन का
    प्रभाव कहा जा सकता है।
    ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वेदाध्ययन में प्रवेश का द्वार है। इसका कारण यह है कि ऋषि दयानन्द वेदों के मर्मज्ञ
    विद्वान थे। उन्होंने चारों वेदों का सार अपने इस ग्रन्थ में प्रस्तुत किया है। हमें इस ग्रन्थ का सबसे बड़ा महत्व इसका हिन्दी व
    संस्कृत दोनों भाषाओं में रचा जाना भी लगता है। ऋषि के शब्दों को पढ़कर हमारा सम्बन्ध सीधा ऋषि की आत्मा से निकले
    शब्दों व साक्षात् उनकी आत्मा से हो जाता है। यद्यपि आज ऋषि हमारे सम्मुख व निकट अपनी आत्मा व साक्षात् रूप में
    विद्यमान नहीं है परन्तु उनकी आत्मा से निकले शब्द भी उनकी विद्या एवं भावनाओं का दिग्दर्शन कराते हैं।
    ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका एवं उनके ग्रन्थों को पढ़ते हुए हमें उनके सान्निध्य के अनुभव व उसकी प्रतीती होती है जो अत्यन्त
    सुखद एवं तृप्तिदायक होती है। वह लोग निश्चय ही भाग्यशाली है जो नित्यप्रति ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों का अध्ययन करते
    हैं। इससे उनका ऋषि दयानन्द के साथ सत्संग हो जाता है और इसका लाभ भी निःसन्देह ज्ञानवृद्धि सहित जीवन के लक्ष्य
    मोक्ष प्राप्ति कराने में सहायक होता है।यह साधारण बात नहीं है।
    ऋषि दयानन्द ने वेदों को सभी सत्य विद्याओं का भण्डार कहा है। ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ग्रन्थ की रचना करते
    समय उन्हें इस बात का ध्यान रहा है कि इस ग्रन्थ से वेद विषयक इस मान्यता का पोषण होना चाहिये। अतः उन्होंने निम्न
    विषयों पर वेदों की मान्यताओं एवं सिद्धान्तों के वेदमन्त्रों को प्रस्तुत कर उनका सत्यार्थ प्रस्तुत किया है।
    ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में सम्मिलित किये गये विषय निम्न हैं‘
    1- ईश्वर प्रार्थना विषय
    2- वेदोत्पत्ति विषय
    3- वेदानां नित्यत्व विचारः
    4- वेद विषय विचार
    5- वेद संज्ञा विचार
    6- ब्रह्म विद्या विषय
    7- वेदोक्त धर्म विषय
    8- सृष्टि विद्या विषय
    9- पृथिव्यादि लोक भ्रमण विषय
    10- आकर्षण अनुकर्षण विषय
    11- प्रकाश्यप्रकाशक विषय
    12- गणित विद्या विषय
    13- ईश्वर स्तुति प्रार्थना याचना समर्पण विषय

    3

    14- उपासना विषय
    15- मुक्ति विषय
    16- नौ विमान आदि विद्या विषय
    17- तार विद्या का मूल
    18- वैद्यकशास्त्रमूलोद्देशः
    19- पुनर्जन्म विषय
    20- विवाह विषय
    21- नियोग विषय
    22- राज-प्रजा-धर्म विषय
    23- वर्णाश्रम विषय
    24- पंचमहायज्ञ विषय
    25- ग्रन्थ प्रामाण्य अप्रमाण्य विषय
    26- अधिकार अनाधिकार विषय
    27- पठनपाठन विषय
    28- वेदभाष्यकरण शंका-समाधान आदि विषय
    29- प्रतिज्ञा विषय
    30- प्रश्नोत्तर विषय
    31- वैदिक प्रयोग विषय
    32- स्वर व्यवस्था विषय
    33- वैदिक व्याकरण नियम
    34- अलंकार भेद विषय
    35- ग्रन्थ संकेत विषय
    वेदों के माध्यम से ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में जो ज्ञान दिया है वह मन्त्रों के रूप में है। मन्त्र शब्द-वाक्यरूपों में हैं।
    यह ज्ञान अधिकांश पद्यमय है। वेदों का भाष्य करते हुए ऋषि दयानन्द जी ने वेदों के मन्त्रों वा पद्यों के पदों का सन्धि-
    विच्छेद कर शब्दों को क्रम से अन्वय वा व्यवस्थित कर उनके पदों व शब्दों का संस्कृत व हिन्दी में अर्थ दिया है। इसके साथ ही
    मन्त्र का भावार्थ भी दिया गया है। इन्हें पढ़कर मन्त्र में ईश्वर के सन्देश को जाना जा सकता है। ऋषि दयानन्द ने चारों वेदों के
    लभगग 20,500 मन्त्रों का अध्ययन कर व उनके अर्थों को जानकर ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ग्रन्थ की रचना की है। यह एक
    असम्भव सा कार्य था जिसे ऋषि दयानन्द ने अपने वैदुष्य एवं योग बल से सम्भव कर दिखाया। हमारा सौभाग्य है कि हमें
    ऋषि दयानन्द के किये भाष्य सहित अवशिष्ट भाग पर उनके मार्गानुगामी आर्य विद्वानों के भाष्य सुलभ हैं जिसके द्वारा हम
    वेदों के पदार्थ वा शब्दार्थ सहित मन्त्रों के भावार्थ को भी जान सकते हैं।
    ऋषि दयानन्द के साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान पं0 युधिष्ठिर मीमांसक जी ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का महत्व बताते
    हुए लिखा है कि ‘ऋषि दयानन्द सरस्वती के समस्त ग्रन्थों में ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का महत्व सब से अधिक है, क्योंकि इस
    ग्रन्थ में ऋषि दयानन्द ने वेद के उन महत्वपूर्ण सिद्धान्तों और वेदार्थ की प्रक्रिया की व्याख्या की है, जिस पर ऋषि दयानन्द
    कृत वेदभाष्य आधृत है। इतना ही नहीं, वेद के प्राचीन व्यख्यानरूप ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद् के तत्वों को वास्तविक
    रूप में समझने का भी यही एकमात्र साधन है।’

    4.पं0 युधिष्ठिर मीमांसक जी ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका की रचना पर भी प्रकाश डाला है। वह लिखते हैं कि ‘ऋषि
    दयानन्द ने भाद्र शुक्ला 1 वि. सं. 1933 (20 अगस्त 1876) से वेदभाष्य की नियमित रूप से रचना आरम्भ की, और साक्षात्
    वेदभाष्य बनाने से पूर्व वेद और उसके भाष्य के सम्बन्ध में जो आवश्यक जानकारी देना अपेक्षित थी, उसके लिये
    ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका नाम की भूमिका लिखनी आरम्भ की। इस भूमिका की पाण्डुलिपि (रफ) कापी लगभग तीन मास में
    पूर्ण हो गई, परन्तु उसके पीछे कई मास इसी भूमिका के परिवर्धन व परिष्करण में लग गए। ऋग्वेदादिभाश्यभूमिका की महत्ता
    को ध्यान में रखकर ऋषि दयानन्द ने इसमें कई बार परिवर्धन वा परिष्करण किए। परोपकारिणी सभा के संग्रह में भूमिका के
    6 हस्तलेख विद्यमान है, जो उत्तरोत्तर परिष्कृत वा परिवर्धित हुए हैं। अन्तिम परिष्कृत हस्तलेख का आरम्भ विक्रमी सम्वत्
    1933 के फाल्गुन के पूर्वार्ध में हुआ, ऐसा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के निम्न वचन से ज्ञात होता है–
    जैसे विक्रम संवत् 1933 फाल्गुन मास, कृष्ण पक्ष, षष्ठी, शनीवार के दिन के चतुर्थ प्रहर के प्रारम्भ में यह बात हमने
    लिखी। ऋभाभू0 पृष्ठ 28 (रामलाल कपूर न्यास द्वारा प्रकाशित आर्यसमाज स्थापना शताब्दी संस्करण संस्करण)’
    वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है। वेद मन्त्र, छन्द व स्वरों में बद्ध हैं। ऋषियों ने सभी वेद मन्त्रों के देवता व ऋषि भी निश्चित
    किये थे जो अद्यावधि लिखे जाने की परम्परा है। वेदों मन्त्रों के सत्यार्थ मन्त्र-भाष्य के रूप में ऋषि दयानन्द के जीवनकाल में
    उपलब्ध नहीं थे। इसके विपरीत सायण एवं महीधर के जो वेदार्थ थे वह अशुद्ध व दूषित थे, जिसका उल्लेख ऋषि दयानन्द ने
    सोदाहरण प्रस्तुत किया है। इसी कारण ऋषि को वेदों के सत्यार्थ को प्रस्तुत करने के लिये वेदभाष्य करने की योजना बनानी
    पड़ी जिसके लिये उन्होंने प्रथम ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका ग्रन्थ की रचना की थी जिससे उनके वेदभाष्य के पाठकों को वेदार्थ
    समझने में सुविधा हो। ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका वेदों पर लिखा गया एक अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका
    को पढ़े बिना ऋषि के वेद भाष्य से भी वह लाभ नहीं होता जो कि भूमिका को पढ़ने के बाद होता है। सभी वेदज्ञान पिपासुओं को
    ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का अध्ययन अवश्य करना चाहिये। इससे वह वेदों में क्या है, इस प्रश्न के उत्तर सहित वेदों की वर्णन
    शैलियों को भली प्रकार से समझ सकेंगे। ओ३म् शम्।

    -मनमोहन कुमार आर्य

    Sold By : The Rishi Mission Trust
    Add to cart
  • चारों वेदों का भाष्य आठ खंडों में –

    भाष्यकारों के नाम –

    ऋग्वेद – महर्षि दयानन्द सरस्वती (सातवें मंडल के 61वें सूक्त मन्त्र 2 पर्यन्त) पश्चात् – (सम्पूर्ण ऋग्वेद सात खंडों में) आर्यमुनि जी (शेष 10 मण्डल पर्यन्त)

    यजुर्वेद – महर्षि दयानन्द सरस्वती (40 अध्याय पर्यन्त) (सम्पूर्ण यजुर्वेद एक खंड में)

    सामवेद – पं.रामनाथ वेदालङ्कार जी (सम्पूर्ण सामवेद एक खंड में)

    अथर्ववेद – पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी जी (सम्पूर्ण अथर्ववेद दो खंडों में)

    वेद संस्कृति, विज्ञान, शिक्षा के मूलाधार है। वेद विद्या के अक्षय भण्डार और ज्ञान के अगाध समुद्र है। संसार में जितना भी ज्ञान, विज्ञान, कलाएँ हैं, उन सबका आदिस्रोत वेद है। वेद में मानवता के आदर्शों का पूर्णरूपेण वर्णन है। सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों का पथ-प्रदर्शन वेदों के द्वारा ही हुआ था। वेद न केवल प्राचीन काल में उपयोगी थे अपितु सभी विद्याओं का मूल होने के कारण आज भी उपयोगी है और आगे भी होगें। मनुष्यों की बुद्धि को प्रबुद्ध करने के लिए उसे सृष्टि के आदि में परमात्मा द्वारा चार ऋषियों के माध्यम से वेद ज्ञान मिला। ये वेद चार हैं, जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद के नाम से जाने जाते हैं। हम इन चारों वेदों का संक्षिप्त परिचय देते हैं –

    ऋग्वेद – इस वेद में तृण से ईश्वर पर्यन्त सब पदार्थों का विज्ञान बीज रूप में है। इस वेद में प्रमुख रूप से सामाजिक विज्ञान, विमान विद्या, सौर ऊर्जा, अग्नि विज्ञान, शिल्पकला, राजनीति विज्ञान, गणित शास्त्र, खगोल विज्ञान, दर्शन, व्यापार आदि विद्याओं का वर्णन हैं।

    इस वेद पर ऋषि दयानन्द जी का 7वें मण्डल के 61 वें सूक्त के दूसरे मन्त्र तक भाष्य है। दैव-दुर्विपाक से ये भाष्य स्वामी दयानन्द जी द्वारा पूर्ण न हो सका। शेष भाग आर्यमुनि जी द्वारा किया गया हैं। ये भाष्य नैरूक्तिक शैली से परिपूर्ण होने के कारण वेदों के नित्यत्व को स्थापित करता है तथा युक्तियुक्त और सरल होने से अत्यन्त लाभकारी है।
    ज्ञान स्वरूप परमात्मा प्रदत्त दूसरा वेद है –

    यजुर्वेद – इस वेद की प्रशंसा करते हुए, फ्रांस के विद्वान वाल्टेयर ने कहा था – “इस बहुमूल्य देन के लिए पश्चिम पूर्व का सदा ऋणी रहेगा।
    यज्ञों पर प्रकाश करने से इस वेद को यज्ञवेद भी कहते हैं। इस वेद में यज्ञ अर्थात् श्रेष्ठकर्म करने की और मानवजीवन को सफल बनाने की शिक्षा दी गई है। जो कि पहले ही मन्त्र – “सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मणे” के द्वारा दी गई है। इस वेद में धर्मनीति, समाजनीति, अर्थनीति, शिल्प, कला-कौशल, ज्यामितीय गणित, यज्ञ विज्ञान, भाषा विज्ञान, स्मार्त और श्रौत कर्मों का ज्ञान दिया हुआ है। इस वेद का चालीसवाँ अध्याय अध्यात्मिक तत्वों से परिपूर्ण है। यह अध्याय ईशावस्योपनिषद् के नाम से प्रसिद्ध है।

    इस वेद पर ऋषि दयानन्द का सम्पूर्ण भाष्य है। महर्षि का भाष्य अपूर्व एवं अनूठा है। उव्वट और महीधर के भाष्य इतने अश्लील हैं कि उनहें सभ्य-समाज के समक्ष बैठकर पढा नहीं जा सकता है, इसके विपरीत महर्षि का भाष्य इस अश्लीलता से सर्वथा रहित है। महर्षि दयानन्द का भाष्य वैदिक सत्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन करता है तथा मनुष्य के दैनिक कर्त्तव्यों का सन्देश और उपदेश देता है।
    इस वेद के पश्चात् सामवेद का लघु परिचय देते हैं –

    ये वेद आकार की दृष्टि से सबसे छोटा है, परन्तु महत्व की दृष्टि से अन्य वेदों के समान ही है। इस वेद में उच्चकोटि के आध्यात्मिक तत्वों का विशद वर्णन है, जिनपर आचरण करने से मनुष्य अपने जीवन के चरम लक्ष्य प्रभु-दर्शन की प्राप्ति कर सकता है।
    इस वेद द्वारा संगीतशास्त्र का विकास हुआ है। इस वेद में आध्यात्मिक विषय के साथ-साथ संगीत, कला, गणित विद्या, योग विद्या, मनुष्यों के कर्तव्यों का वर्णन है। छान्दोग्य उपनिषद् में “सामवेद एव पुष्पम्” कहकर इसकी महत्ता का प्रतिपादन किया है।

    इस वेद पर ऋषि दयानन्द का भाष्य नही है लेकिन उनहीं की शैली का अनुसरण करते हुए पं.रामनाथ वेदालङ्कार जी का भाष्य है। यह भाष्य संस्कृत और आर्यभाषा दोनो में है। इस भाष्य में संस्कृत-पदार्थ भी आर्यभाषा-पदार्थ के समान सान्वय दिया है। इसमें प्रत्येक दशति के पश्चात् उसकी पूर्व दशति से संगीति दर्शायी है। अध्यात्म उपदेश से पृथक् इस भाष्य में राजा-प्रजा, आचार्य-शिष्य, भौतिक सूर्य, भौतिक अग्नि, आयुर्वेद, शिल्प आदि व्यवहारिक उपदेशों का दर्शन भी किया जा सकता है।
    इस वेद के पश्चात् अथर्ववेद का परिचय देते हैं –

    इस वेद में ज्ञान, कर्म, उपासना का सम्मिश्रण है। इसमें जहाँ प्राकृतिक रहस्यों का उद्घाटन है, वहीं गूढ आध्यात्मिक रहस्यों का भी विवेचन है। अथर्ववेद जीवन संग्राम में सफलता प्राप्त करने के उपाय बताता है। इस वेद में गहन मनोविज्ञान है। राष्ट्र और विश्व में किस प्रकार से शान्ति रह सकती है, उन उपायों का वर्णन है। इस वेद में नक्षत्र-विद्या, गणित-विद्या, विष-चिकित्सा, जन्तु-विज्ञान, शस्त्र-विद्या, शिल्प-विद्या, धातु-विज्ञान, स्वपन-विज्ञान, अर्थनीति आदि अनेकों विद्याओं का प्रकाश है।

    इस वेद पर प्रसिद्ध पं.क्षेमकरणदास जी त्रिवेदी द्वारा रचित भाष्य है। इसमें पदक्रम, पदार्थ और अन्वय सहित आर्यभाषा में अर्थ किया गया है। अर्थ को सरल और रोचक रखा गया है। स्पष्टता और संक्षेप के ध्यान से भाष्य का क्रम यह रक्खा है –
    1 देवता, छन्द, उपदेश।
    2 मूलमन्त्र – स्वरसहित।
    3 पदपाठ – स्वरसहित।
    4 सान्वय भावार्थ।
    5 भाषार्थ।
    6 आवश्यक टिप्पणी, संहिता पाठान्तर, अनुरूप विषय और वेदों में मन्त्र का पता आदि विवरण।
    7 शब्दार्थ व्याकरणादि प्रक्रिया-व्याकरण, निघण्टु, निरूक्त, पर्याय आदि।

    इस तरह ये चारों वेदों का समुच्चय है। आशा है कि आप सब इस वेद समुच्चय को मंगवाकर, अध्ययन और मनन से अपने जीवन में उन्नति करेंगे।

    Sold By : The Rishi Mission Trust
    Add to cart

Cart

Cart

Your Cart is Empty

Back To Shop