ऋषि मिशन न्यास परिवार की वेबसाइट पर आपका बहुत बहुत हार्दिक स्वागत है ......नमस्ते जी संस्कार चंद्रिका लेखक - डॉ सत्यव्रत सिद्धा अलंकार अभी से दिनांक 03/12/2022 सायं काल 5: 00 तक 350/- के स्थान पर सिर्फ 280/- में उपलब्ध

Rishi Mission is a Non Profitable Organization In India

Cart

Your Cart is Empty

Back To Shop

Category: सत्यार्थ प्रकाश

Showing all 10 results

  • इस संस्करण के संबंध में !!!                                                                                           परोपकारिणी सभा अजमेर में महर्षि दयानंद सरस्वती के प्राय: सभी ग्रंथों की मूल प्रतियां है,  इनमें से सत्यार्थ प्रकाश की दो प्रतियां है, इनके नाम “मूलप्रति” तथा “मुद्रणप्रति” रखे हुए हैं, मूलप्रति से  मुद्रणप्रति तैयार की गई थी, मुद्रणप्रति (प्रेस कापी) के आधार पर सन १८८४  इसवी  में           सत्यार्थप्रकाश  का द्वितीय संस्करण छपा था, इतने लंबे अंतराल में  विभिन्न संशोधकों  के हाथों इतने संशोधन, परिवर्तन तथा परिवर्धन हो गए कि मूलपाठ का निश्चय करना कठिन होने लग गया था, मूल प्रति से मुद्रण प्रति लिखने वाले महर्षि के लेखक तथा प्रतिलिपिकर्ता  ने सर्वप्रथम यह फेरबदल की थी, महर्षि अन्य लोकोपकारक  कार्यों में व्यस्त रहने से तथा लेखक पर विश्वास करने से मुद्रणप्रति को मूलप्रति से अक्षरश: से नहीं मिला सके, परिणामत: लेखक नें  प्रतिलिपि करते समय अनेक  स्थलों  पर मूल पंक्तियां छोड़कर उनके आशय के आधार पर अपने शब्दों में महर्षि  का भाव अभिव्यक्त कर दिया,  अनेक स्थानों पर भूल से भी पंक्तियां छूट गई तथा अनेक पंक्तियां दोबारा भी लिखी गई, अनेकत्र  मूल शब्द के स्थान पर पर्यायवाची शब्द भी लिख दिए थे मुंशी समर्थदान  नें भी  पुनरावृति समझकर 13 वें 14 वें  समुल्लास की अनेक आयतें और समीक्षाएं काट दि , यह सब करना महर्षि दयानंद सरस्वती के अभिप्राय से   विरुद्ध होता चला गया,

    परोपकारिणी सभा के अतिरिक्त अन्य प्रकाशको के पास यह सुविधा कभी नहीं रही कि वे  मूलप्रति से मिलान करके महर्षि के सभी ग्रंथों का शुद्धतम पाठ प्रकाशित कर सकें परोपकारिणी सभा की ओर से भी कभी-कभी एक मुद्रणप्रति (प्रेस कापी) से ही मिलान करके प्रकाशन किया जाता रहा मूलप्रति की ओर  विशेष दृष्टिपात नहीं किया गया (किंतु किसी किसी ने कहीं-कहीं पाठ देखकर सामान्य  परिवर्तन किए हैं) और न कभी यह संदेह  हुआ कि दोनों प्रतियों में कोई मूलभूत पर्याप्त अंतर भी हो सकता है,

    गत अनेक शताब्दियों में ऋषि मुनिकृत ग्रंथों में विभिन्न  मतावलम्बियों ने अपने -अपने संप्रदाय के पुष्टियुक्त वचन बना बनाकर प्रक्षिप्त कर दिए हैं इसके परिणामस्वरुप मनुस्मृति,  ब्राह्मणग्रंथ, रामायण, महाभारत, श्रोतसूत्र और गृहसूत्र आदि ग्रंथों में वेददि  शास्त्रों की मान्यताओं के विपरीत भी लेख देखने को मिलते हैं इसी संभावना का भय  है महर्षि दयानंद सरस्वती के ग्रंथों में भी दृष्टिगोचर होने लगा था इस भय के  निवारणार्थ परोपकारिणी  सभा ने निश्चय किया कि महर्षि के हस्तलेखों से   मिलान करके सत्यार्थ प्रकाश आदि  सभी ग्रंथों का शुद्ध संस्करण निकाला जाए इसीलिए अनेक विद्वानों के सहयोग और   सत्परामार्श  के पश्चात संस्करण में निम्नलिखित मापदंड अपनाए गए हैं—

    1. मूले मूलाभावादमूलं मूलम् ( सांख्य १.६७ ) कारण का कारण और मूल का मूल नहीं हुआ करता, इसलिए सबका मूलकारण होने से सत्यार्थप्रकाश की मूलप्रति स्वत: प्रमाण है

    2. मुद्रणप्रति जहां तक मूलप्रति के अनुकूल है, वहां तक उसका पाठ मान्य किया है, प्रतिलिपिकर्ता  द्वारा श्रद्धा अथवा  भावुकतावश बढ़ाये  गए अनावश्यक और अनार्ष  वाक्यों को अमान्य किया है

    3. जहां मुद्रणप्रति में मूलप्रति  से गलत  पाठ उतारा और महर्षि उसमें  यथामति  संशोधन करने का यत्न किया, ऐसी स्थिति में  मूलप्रति  का पाठ   उससे अच्छा होने से उसे स्वीकार किया गया है

    4.मुद्रण प्रति में महर्षि जी ने जहाँ-जहाँ सव्ह्स्त  से आवश्यक परिवर्तन परिवर्तन किए हैं वे सभी स्वीकार किए हैं

    5. सन १८८३ से १८८४ तक प्रकाशित हुए  सत्यार्थ प्रकाश के द्वितीय संस्करण में प्रूफ देखते समय   मुद्रणप्रति के पाठ से हटकर जो  परिवर्तन-परिवर्धन  किए गए थे वे  भी प्राय: सभी अपनाएं हैं

    कुछ विद्वान महर्षि की भाषा में वर्तमान समय अनुकूल परिवर्तन करने का तथा  भाव को स्पष्ट करने के लिए कुछ शब्द बढ़ा  देने का व्यर्थ आग्रह किया करते हैं यह अनुचित है अतः इस संस्करण में ऐसा कुछ नहीं किया गया है

    इस प्रकार इस ग्रंथ को शुद्धतम  प्रकाशित करने के लिए विशेष यत्न किया गया है पुनरपि अनवधानतावश वस्तुतः  कोई त्रुटि रह गई हो तो शुद्धभाव से सूचित करने पर आगामी आवर्ती में उसे शुद्ध कर दिया जाएगा क्योंकि ऐसे कार्यों में दुराग्रह और  अभिमान के छोड़ने से ही सत्यमत गृहित  हो सकता है इसी में विद्वता  की शोभा भी  है

    Sold By : The Rishi Mission Trust
    Add to cart
  • नमस्ते जी !!! अब आप घर बैठे सत्यार्थ प्रकाश पुस्तक बिल्कुल free भी प्राप्त कर सकते हैं संपर्क करें 9314394421

    Sold By : The Rishi Mission Trust
    Add to cart
  • श्रीमान मोहन चन्द जी आर्य के 15 वर्षो का पुरुषार्थ इस संसकरण में आपको देखने को मिलेगा जो कुल २३८० पृष्ठों में समाहित है बड़ी ही सरल भाषा मेप्रकाशित यह संसकरण है आप इसे पढ़ कर अवश्य ही गदगद हो जायेंगे, यह हमारा आपसे वादा है इसकी विषय सुची ही 75 पृष्ठों में लिखी गई है

    Sold By : The Rishi Mission Trust
    Add to cart
  • सत्यार्थ प्रकाश ऋषि दयानंद सरवती द्वारा रचित एक अनमोल ग्रंथ

    धर्म क्या है अधर्म क्या है ,पाप क्या है पुण्य क्या है पाखंड किसे कहते है ईश्वर किसे कहते है कहाँ रहता है हमें किसकी आराधना करनी चाहिए किसकी नहीं करनी चाहिए मै कौन हूँ कहाँ से आया हूँ कहाँ जाऊंगा कहाँ से आया हूँ मेरा सनातन नाम क्या है यह संसार किसने बनाया है कौन इसे चला रहा है कौन इसे मिटाएगा ज्योतिष किसे कहते है कौन सी ज्योतिष सही है कौन सी ज्योतिष मिथ्या है आदि आदि जीवन के प्रत्येक पहलु को महर्षि ने ध्यान में रखकर यह ग्रंथ रचा है

    महर्षि देव दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित अमर कालजयी ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश का इस पुस्तक में विशेष संकलन  किया गया है, जिसे पढने में आसानी हो शब्दों का आकार बड़ा है यह पुस्तक १४ समुल्लासों अर्थात (अध्याय) में रचा गया है इसमें  कुल ७३६ पृष्ठ हैं, जिसमें महर्षि ने ईश्वर किसे कहते है उसके क्या क्या नाम है प्रथम समुल्लास में बहुत ही अच्छी प्रकार से समझाया है, दुसरे समुल्लास में बाल शिक्षा के विषय में मात्रीवत समझाया है, तीसरे समुल्लास में बच्चों को क्या क्या शिक्षा देने योग्य है बताया है, चतुर्थ समुल्लास में विवाह आदि के विषय में बताया है, पंचम समुल्लास में वानप्रस्थ, संन्यास के सम्बन्ध में बताया है, छठे समुल्लास में राज व्यवस्था के बारे में बताया है, सातवें समुल्लास में  ईश्वर विषयक भ्रांतियों का निराकरण किया है, आठवें समुल्लास में सृष्टि के विषय में बताया है नवमें समुल्लास में  विद्या क्या है अविद्या क्या है बांध क्या है मोक्ष क्या है, दसम समुल्लास में करने योग्य कार्य क्या है न करने योग्य क्या है क्या भोजन करें क्या नहीं इस के विषय में बताया है, ग्यारहवें समुल्लास में हिन्दुओं में क्या क्या पाखंड फैला है जिससे हमारा कितना अहित हो रहा है, बारहवें समुल्लास में जैन मत के विषय में लिखा है, तेरहवें समुल्लास में ईसाईयों के विषय में लिखा है, चौदहवें समुल्लास में मुसलमानों के विषय में लिखा है व अंत में स्वयं महर्षि दयानन्द सरस्वती क्या मानते है आदि के विषय में अपना मत बताया है स्वामी  दयानन्द सरस्वती जी द्वारा लिखित है आप इस कालजयी ग्रंथ को  अवश्य एक बार पढ़ें

    Sold By : The Rishi Mission Trust
    Add to cart

Cart

Your Cart is Empty

Back To Shop