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तनाव से मुक्ति tanaav se mukti
Rs.150.00Rs.120.00Sold By : The Rishi Mission Trustमनुष्य ईश्वर की सुन्दरतम कृति है। इस मानव ने जहाँ एक ओर अनेकों वैज्ञानिक व तकनीकी खोजें कर ली हैं, भौतिक उन्नति के उच्च स्तर पर पदार्पण कर लिया है, अनेकों सुख-सुविधाएं को प्रदान करने वाली सामग्री को जुटा लिया है, वहीं दूसरी ओर वह दुःख व अशान्ति के गर्त में डूबता चला जा रहा है। ज्यों-ज्यों वह सुखी होना चाहता है त्यों-त्यों वह दुःखी होता चला जाता है, क्योंकि धन, रोटी तो दे सकता है, पर भूख नहीं, धन बिस्तर तो दे सकता है पर नींद नहीं, धन सुख तो दे सकता है पर आनन्द नहीं । आज के युग का सबसे बड़ा प्रश्न है मनुष्य को सच्ची सुख व शान्ति कैसे प्राप्त हो ? अनेक धार्मिक ग्रन्थों में मानव को अपना जीवन यापन करने तथा सुख-शान्ति तथा आनन्द को प्राप्त करने के लिए उन मार्गों का दिग्दर्शन किया है, जिस पर चलकर मनुष्य अपना जीवन सही ढंग से चलाकर इस दुःख सागर से पार होकर मोक्षरूपी अनन्त आनन्द के महासागर में गोते लगा सकता है। किन्तु दुःख की बात तो यह है कि हमने ऋषिकृत ग्रन्थों में बताए हुए रास्तों पर चलने का प्रयत्न ही नहीं किया । यदि हम अपने जीवन को उन आर्ष ग्रन्थों के अनुकूल ढ़ालने का प्रयत्न करेंगे, तो हम अपने तनावमय जीवन को आनन्दमय बना सकते हैं ।
– प्रस्तुत पुस्तक में मैंने योगानुकूल जीवन-यापन करने के कुछ तौरतरीकों का उल्लेख किया है, जिस पर चलकर मनुष्य तनाव से दूर रह सकता है, सुख-शान्ति को प्राप्त कर सकता है, और अन्ततः मोक्षरूपी आनन्द का आनन्द भी ले सकता है ।
वैदिक, जैन, बौद्ध आदि विभिन्न धर्मों व सम्प्रदायों की जीवन एवं ध्यान पद्धति पर चिन्तन व मनन किया तथापि मेरी इच्छा यही रही कि यह पुस्तक किसी मत विशेष की धरोहर न होकर सभी मनुष्यों के पढ़ने योग्य बन सके और वे इसे पढ़कर व आचरण कर अपने को तनावमुक्त बना सकें ।
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धर्म का आदिस्रोत dharm ka aadisrot
Rs.100.00Rs.80.00Sold By : The Rishi Mission Trustधर्म का मूल ईश्वर है
– धर्म का उत्पत्ति- स्थान क्या है ? किसी मत विशेष का नहीं प्रत्युत उस धर्म का मूल क्या है जिसके अवान्तर रूप से विविध प्रकार के मत विद्यमान हैं। साधारणतया इस प्रश्न के दो उत्तर हैं – (१) यह कि धर्म का मूल ईश्वर है और (२) यह कि उसकी उत्पत्ति मनुष्य से है। प्रथम विचार इस बात की उपेक्षा नहीं करता कि वर्त्तमान धर्मों के विकास और वृद्धि पर मनुष्यों का, उनके जातीय इतिहास और देश की भौगोलिक अवस्था तक का बड़ा प्रभाव पड़ा है। केवल इस बात पर बल दिया है कि धर्म का आदि मूल कारण ईश्वर है ।
यह पुस्तक इस महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर पूर्णरूपेण मीमांसा करने की प्रतिज्ञा नहीं करती । इसका उद्देश्य संसार के मुख्य-मुख्य मतों के मिलान और अनुशीलन से केवल यह सिद्ध करना है कि नवीन मतों का पता पुराने मतों से और इन पुराने मतों का पता और अधिक प्राचीन मतों से चल सकता है। इस प्रकार उत्तरोत्तर पता लगाते हुए हम मनुष्य जाति के प्राचीनतम पवित्र धर्म तक पहुंच जाते हैं। मतों के परस्पर मिलान पूर्वक अनुशीलन से यह सिद्ध हो जायेगा कि वास्तव में धर्म की सीमा के अन्तर्गत किसी प्रकार का नया आविष्कार कभी नहीं हुआ। धर्म के मुख्य सिद्धान्त जिन्हें उसका सार कहना चाहिये उतने ही पुराने हैं जितनी कि मानव जाति । इससे सिद्ध होता है कि सृष्टि के आरम्भ काल में परमेश्वर ने धार्मिक ज्ञान का बीज मनुष्य के लिए दिया था। और यही धर्म-ज्ञान का बीज मानव जाति के ग्रन्थ भण्डार के सर्वसम्मत प्राचीनतम वेद में पाया जाता है ।
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दयानन्दोक्त औषधि आरोग्य सूत्र dayanandokt aushadhi arogy sootr
Rs.125.00Rs.100.00Sold By : The Rishi Mission Trustप्रो० डॉ० लोखण्डेजी ने स्वामी दयानन्द सरस्वती रचित सभी पुस्तकों के सागर से मोती चुनकर एक जगह संकलित करने का कठिन श्रम किया है। इस पुस्तक की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि स्वामीजी के औषधि एवं आरोग्य सूत्रों को आधुनिक चिकित्सा के सिद्धान्तों से तुलना कर आज के सन्दर्भ में ये कितने उपयोगी हैं यह दर्शाने का प्रयत्न किया गया है। इस संकलन के निम्न प्रकरणों में उन्होंने विस्तार से स्वामीजी और आधुनिक चिकित्सकों के सिद्धान्तों को प्रस्तुत किया है जिनमें ब्रह्मचर्य एवं वीर्यरक्षा, आहार-विहार, दिनचर्या, यज्ञ एवं पर्यावरण, व्यवहार कौशल्य, योगासन एवं प्राणायाम, विवाह और गृहस्थाश्रम, ऋतुकाल एवं गर्भाधान विधि, प्रसूति बालसंगोपन, मांस भक्षण, दुर्व्यसनों से हानि, रोग एवं औषधि प्रमुख हैं।
मुझे लगता है कि मानव सर्वांगीन आरोग्य की प्राप्ति हेतु इन आरोग्य
सूत्रों का पालन करे तो वह जीवन में अवश्य सुखी होगा। मनुष्य केवल शारीरिक व्याधियों से ही रोगग्रस्त नहीं होता, अपितु मानसिक एवं आत्मिक दुःखों से भी त्रस्त रहता है। आज का विज्ञान केवल शरीर पर ही गौर करने का आदि हो गया है। आज का आरोग्य विज्ञान मनुष्य के सर्वांगीन दुःखों एवं व्याधियों से मुक्ति दिलाने के लिए कृत संकल्प नहीं है लेकिन आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा तथा सुव्यवहार दर्शन मनुष्य को सर्वतोमुखी सुखी बना सकता है। स्वामी दयानन्दजी ने औषधि चिकित्सा के साथ-साथ, रहन-सहन, दिनचर्या, गृहस्थ, ब्रह्मचर्य, व्यवहार कौशल्य, योग-प्राणायाम-आसनादि के द्वारा मानव मात्र को स्वस्थ एवं निरोगी बनाने का यत्र-तत्र अपने ग्रन्थों में उल्लेख किया है।
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