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सत्यार्थ प्रकाश 41वां संस्करण

Rs.70.00

वैदिक पुस्तकालय अजमेर द्वारा महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित एक कालजयी महान ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश का यह 41 वां  संस्करण है , जिसका  लागत मूल्य सिर्फ 70/- रु. है

इस संस्करण के सम्बन्ध में

इस संस्करण को शुद्ध , सुन्दर और प्रामाणिक बनाने के लिये आर्य जगत के शोध विद्वान पंजाब विश्वविद्यालय के रसायन शास्त्र के पूर्व विभागाध्यक्ष ऋषि में अनन्य निष्ठा रखने वाले डॉ रामप्रकाश जी तथा आर्ष साहित्य और ऋषि कार्य के लिए समर्पित योग्य विद्वान् श्री विरजानंद जी दैवकरणी ने जो परिश्रम किया है उसका मूल्याङ्कन परिश्रमी विद्वान् ही कर सकता है आप दोनों ने छ: मास से अधिक समय लगाकर सम्पूर्ण ग्रंथ का दोनों पांडुलिपियों और सत्यार्थप्रकाश के द्वितीय संस्करण से मिलान करने का कठिन कार्य संपन्न किया है, साथ ही आर्यजगत के प्रसिद्ध शोध विद्वान् डॉ सुरेन्द्र कुमार तथा श्री मोहन चन्द जी (अजमेर ) के परामर्श एवं सुझाव इस कार्य में पर्याप्त सहायक रहे हैं

आप से निवेदन है की आप के पास किसी भी प्रकाशन की सत्यार्थ प्रकाश उपलब्ध हो फिर भी आप इसे तुलनात्मक अध्ययन के किये अवश्य पढ़ें

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Weight 600 g
Dimensions 8.6 × 5.6 × 1 cm

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    महर्षि देव दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित अमर कालजयी ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश का इस पुस्तक में विशेष संकलन  किया गया है, जिसे पढने में आसानी हो शब्दों का आकार बड़ा है यह पुस्तक १४ समुल्लासों अर्थात (अध्याय) में रचा गया है इसमें  कुल ७३६ पृष्ठ हैं, जिसमें महर्षि ने ईश्वर किसे कहते है उसके क्या क्या नाम है प्रथम समुल्लास में बहुत ही अच्छी प्रकार से समझाया है, दुसरे समुल्लास में बाल शिक्षा के विषय में मात्रीवत समझाया है, तीसरे समुल्लास में बच्चों को क्या क्या शिक्षा देने योग्य है बताया है, चतुर्थ समुल्लास में विवाह आदि के विषय में बताया है, पंचम समुल्लास में वानप्रस्थ, संन्यास के सम्बन्ध में बताया है, छठे समुल्लास में राज व्यवस्था के बारे में बताया है, सातवें समुल्लास में  ईश्वर विषयक भ्रांतियों का निराकरण किया है, आठवें समुल्लास में सृष्टि के विषय में बताया है नवमें समुल्लास में  विद्या क्या है अविद्या क्या है बांध क्या है मोक्ष क्या है, दसम समुल्लास में करने योग्य कार्य क्या है न करने योग्य क्या है क्या भोजन करें क्या नहीं इस के विषय में बताया है, ग्यारहवें समुल्लास में हिन्दुओं में क्या क्या पाखंड फैला है जिससे हमारा कितना अहित हो रहा है, बारहवें समुल्लास में जैन मत के विषय में लिखा है, तेरहवें समुल्लास में ईसाईयों के विषय में लिखा है, चौदहवें समुल्लास में मुसलमानों के विषय में लिखा है व अंत में स्वयं महर्षि दयानन्द सरस्वती क्या मानते है आदि के विषय में अपना मत बताया है स्वामी  दयानन्द सरस्वती जी द्वारा लिखित है आप इस कालजयी ग्रंथ को  अवश्य एक बार पढ़ें

    Sold By : The Rishi Mission Trust
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