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Rishi Mission Trust (Vaidic Sahitya Center)

The Vedic literature sales department run by the Rishi Mission Trust has been created keeping in mind the purpose of promoting Vedas, so you can buy and sell more and more Vedic literature and cooperate with us in fulfilling our objective.

Showing 1–36 of 974 results

  • यह प्रश्न बहुत साधारण है और इसका उत्तर उतना ही जटिल है कारण हम न तो सदैव दुःखी रहते हैं न सुखी रहते हैं। कई बार हम चिंतित होते हैं तो कई बार कुछ प्रसंगों को लेकर हमारे मन में जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि दुनिया में हम क्यों आये? हम आये तो जीवन को किस तरह जियें ? हम दुःखी क्यों होते हैं? क्या है चिंता? क्या है धर्म? क्या है पूजा उपासना के अर्थ ? |आखिर वो भगवान कैसा है जिसकी सब पूजा करते हैं? यही नहीं कई बार हम जब ज्यादा परेशान होते हैं तो ज्योतिष और बाबाओं के चक्कर में भी आ जाते हैं इन सब सवालों के जवाब यहां नहीं दिये जा सकते, लेकिन “सत्यार्थ प्रकाश का हर एक समुल्लास (अध्याय) आपके ज्ञान और शंकाओं का निवारण एक गुरु की तरह करता है जो सिर्फ सच्ची शिक्षा देता है । माना कि आज का जीवन आधुनिक है, हम भौतिक युग में जी रहे हैं, हमारे हाथों में कम्प्यूटर है, महंगे फोन हैं, हम आधुनिकता की बातें करते हैं लेकिन जब हम किसी आर्थिक, सामाजिक या पारिवारिक परेशानी में आते हैं तब हम हजारों साल पुराने अन्धविश्वास में जाने अनजाने में फंस जाते हैं। सर्वविदित है कि 140 सालों में लाखों लोगों का जीवन परिवर्तित करने वाला, सत्य और असत्य की विवेचना करने वाले महानतम ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के रचनाकार महर्षि दयानन्द सरस्वती मूल रूप से गुजराती थे लेकिन इसके बावजूद उन्होंने “सत्यार्थ प्रकाश की रचना हिन्दी भाषा में की। क्योंकि महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने इस ग्रन्थ की रचना किसी एक धर्म के लाभ-हानि के लिए नहीं की अपितु मानव मात्र के कल्याण और ज्ञान वर्धन के लिए की ताकि हम निष्पक्ष होकर सत्य और असत्य का अन्तर जान सकें और असत्य मार्ग को छोड़कर सत्य मार्ग की ओर बढ़ सकें क्योंकि उनका मानना था कि दुःख का कारण असत्य और अज्ञान है

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  • यह प्रश्न बहुत साधारण है और इसका उत्तर उतना ही जटिल है कारण हम न तो सदैव दुःखी रहते हैं न सुखी रहते हैं। कई बार हम चिंतित होते हैं तो कई बार कुछ प्रसंगों को लेकर हमारे मन में जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि दुनिया में हम क्यों आये? हम आये तो जीवन को किस तरह जियें ? हम दुःखी क्यों होते हैं? क्या है चिंता? क्या है धर्म? क्या है पूजा उपासना के अर्थ ? |आखिर वो भगवान कैसा है जिसकी सब पूजा करते हैं? यही नहीं कई बार हम जब ज्यादा परेशान होते हैं तो ज्योतिष और बाबाओं के चक्कर में भी आ जाते हैं इन सब सवालों के जवाब यहां नहीं दिये जा सकते, लेकिन “सत्यार्थ प्रकाश का हर एक समुल्लास (अध्याय) आपके ज्ञान और शंकाओं का निवारण एक गुरु की तरह करता है जो सिर्फ सच्ची शिक्षा देता है । माना कि आज का जीवन आधुनिक है, हम भौतिक युग में जी रहे हैं, हमारे हाथों में कम्प्यूटर है, महंगे फोन हैं, हम आधुनिकता की बातें करते हैं लेकिन जब हम किसी आर्थिक, सामाजिक या पारिवारिक परेशानी में आते हैं तब हम हजारों साल पुराने अन्धविश्वास में जाने अनजाने में फंस जाते हैं। सर्वविदित है कि 140 सालों में लाखों लोगों का जीवन परिवर्तित करने वाला, सत्य और असत्य की विवेचना करने वाले महानतम ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के रचनाकार महर्षि दयानन्द सरस्वती मूल रूप से गुजराती थे लेकिन इसके बावजूद उन्होंने “सत्यार्थ प्रकाश की रचना हिन्दी भाषा में की। क्योंकि महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने इस ग्रन्थ की रचना किसी एक धर्म के लाभ-हानि के लिए नहीं की अपितु मानव मात्र के कल्याण और ज्ञान वर्धन के लिए की ताकि हम निष्पक्ष होकर सत्य और असत्य का अन्तर जान सकें और असत्य मार्ग को छोड़कर सत्य मार्ग की ओर बढ़ सकें क्योंकि उनका मानना था कि दुःख का कारण असत्य और अज्ञान है

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  • यह प्रश्न बहुत साधारण है और इसका उत्तर उतना ही जटिल है कारण हम न तो सदैव दुःखी रहते हैं न सुखी रहते हैं। कई बार हम चिंतित होते हैं तो कई बार कुछ प्रसंगों को लेकर हमारे मन में जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि दुनिया में हम क्यों आये? हम आये तो जीवन को किस तरह जियें ? हम दुःखी क्यों होते हैं? क्या है चिंता? क्या है धर्म? क्या है पूजा उपासना के अर्थ ? |आखिर वो भगवान कैसा है जिसकी सब पूजा करते हैं? यही नहीं कई बार हम जब ज्यादा परेशान होते हैं तो ज्योतिष और बाबाओं के चक्कर में भी आ जाते हैं इन सब सवालों के जवाब यहां नहीं दिये जा सकते, लेकिन “सत्यार्थ प्रकाश का हर एक समुल्लास (अध्याय) आपके ज्ञान और शंकाओं का निवारण एक गुरु की तरह करता है जो सिर्फ सच्ची शिक्षा देता है । माना कि आज का जीवन आधुनिक है, हम भौतिक युग में जी रहे हैं, हमारे हाथों में कम्प्यूटर है, महंगे फोन हैं, हम आधुनिकता की बातें करते हैं लेकिन जब हम किसी आर्थिक, सामाजिक या पारिवारिक परेशानी में आते हैं तब हम हजारों साल पुराने अन्धविश्वास में जाने अनजाने में फंस जाते हैं। सर्वविदित है कि 140 सालों में लाखों लोगों का जीवन परिवर्तित करने वाला, सत्य और असत्य की विवेचना करने वाले महानतम ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के रचनाकार महर्षि दयानन्द सरस्वती मूल रूप से गुजराती थे लेकिन इसके बावजूद उन्होंने “सत्यार्थ प्रकाश की रचना हिन्दी भाषा में की। क्योंकि महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने इस ग्रन्थ की रचना किसी एक धर्म के लाभ-हानि के लिए नहीं की अपितु मानव मात्र के कल्याण और ज्ञान वर्धन के लिए की ताकि हम निष्पक्ष होकर सत्य और असत्य का अन्तर जान सकें और असत्य मार्ग को छोड़कर सत्य मार्ग की ओर बढ़ सकें क्योंकि उनका मानना था कि दुःख का कारण असत्य और अज्ञान है

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  • हम सत्यार्थ प्रकाश क्यों पढ़ें?
    यह प्रश्न बहुत साधारण है और इसका उत्तर उतना ही जटिल है कारण हम न तो सदैव दुःखी रहते हैं न सुखी रहते हैं। कई बार हम चिंतित होते हैं तो कई बार कुछ प्रसंगों को लेकर हमारे मन में जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि दुनिया में हम क्यों आये? हम आये तो जीवन को किस तरह जियें ? हम दुःखी क्यों होते हैं? क्या है चिंता? क्या है धर्म? क्या है पूजा उपासना के अर्थ ? |आखिर वो भगवान कैसा है जिसकी सब पूजा करते हैं? यही नहीं कई बार हम जब ज्यादा परेशान होते हैं तो ज्योतिष और बाबाओं के चक्कर में भी आ जाते हैं इन सब सवालों के जवाब यहां नहीं दिये जा सकते, लेकिन “सत्यार्थ प्रकाश का हर एक समुल्लास (अध्याय) आपके ज्ञान और शंकाओं का निवारण एक गुरु की तरह करता है जो सिर्फ सच्ची शिक्षा देता है ।
    माना कि आज का जीवन आधुनिक है, हम भौतिक युग में जी रहे हैं, हमारे हाथों में कम्प्यूटर है, महंगे फोन हैं, हम आधुनिकता की बातें करते हैं लेकिन जब हम किसी आर्थिक, सामाजिक या पारिवारिक परेशानी में आते हैं तब हम हजारों साल पुराने अन्धविश्वास में जाने अनजाने में फंस जाते हैं।
    सर्वविदित है कि 140 सालों में लाखों लोगों का जीवन परिवर्तित करने वाला, सत्य और असत्य की विवेचना करने वाले महानतम ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के रचनाकार महर्षि दयानन्द सरस्वती मूल रूप से गुजराती थे लेकिन इसके बावजूद उन्होंने “सत्यार्थ प्रकाश की रचना हिन्दी भाषा में की। हो सकता है जब आप इसे पढ़ना शुरू करें तो इ भाषा आपको मुश्किल लगे किन्तु जब आप पढ़ेंगे तो आपको मानवता और ” धर्म से जुड़े सभी रहस्य उजागर होंगे क्योंकि महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने इस ग्रन्थ की रचना किसी एक धर्म के लाभ-हानि के लिए नहीं की अपितु मानव मात्र के कल्याण और ज्ञान वर्धन के लिए की ताकि हम निष्पक्ष होकर सत्य और असत्य का अन्तर जान सकें और असत्य मार्ग को छोड़कर सत्य मार्ग की ओर बढ़ सकें क्योंकि उनका मानना था कि दुःख का कारण असत्य और अज्ञान है अतः सुख की प्राप्ति के सत्य मार्ग को जानने का प्रयत्न प्रत्येक मनुष्य को करना चाहिए ।

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  • हम सत्यार्थ प्रकाश क्यों पढ़ें?
    यह प्रश्न बहुत साधारण है और इसका उत्तर उतना ही जटिल है कारण हम न तो सदैव दुःखी रहते हैं न सुखी रहते हैं। कई बार हम चिंतित होते हैं तो कई बार कुछ प्रसंगों को लेकर हमारे मन में जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि दुनिया में हम क्यों आये? हम आये तो जीवन को किस तरह जियें ? हम दुःखी क्यों होते हैं? क्या है चिंता? क्या है धर्म? क्या है पूजा उपासना के अर्थ ? |आखिर वो भगवान कैसा है जिसकी सब पूजा करते हैं? यही नहीं कई बार हम जब ज्यादा परेशान होते हैं तो ज्योतिष और बाबाओं के चक्कर में भी आ जाते हैं इन सब सवालों के जवाब यहां नहीं दिये जा सकते, लेकिन “सत्यार्थ प्रकाश का हर एक समुल्लास (अध्याय) आपके ज्ञान और शंकाओं का निवारण एक गुरु की तरह करता है जो सिर्फ सच्ची शिक्षा देता है ।
    माना कि आज का जीवन आधुनिक है, हम भौतिक युग में जी रहे हैं, हमारे हाथों में कम्प्यूटर है, महंगे फोन हैं, हम आधुनिकता की बातें करते हैं लेकिन जब हम किसी आर्थिक, सामाजिक या पारिवारिक परेशानी में आते हैं तब हम हजारों साल पुराने अन्धविश्वास में जाने अनजाने में फंस जाते हैं।
    सर्वविदित है कि 140 सालों में लाखों लोगों का जीवन परिवर्तित करने वाला, सत्य और असत्य की विवेचना करने वाले महानतम ग्रन्थ सत्यार्थ प्रकाश के रचनाकार महर्षि दयानन्द सरस्वती मूल रूप से गुजराती थे लेकिन इसके बावजूद उन्होंने “सत्यार्थ प्रकाश की रचना हिन्दी भाषा में की। हो सकता है जब आप इसे पढ़ना शुरू करें तो इ भाषा आपको मुश्किल लगे किन्तु जब आप पढ़ेंगे तो आपको मानवता और ” धर्म से जुड़े सभी रहस्य उजागर होंगे क्योंकि महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने इस ग्रन्थ की रचना किसी एक धर्म के लाभ-हानि के लिए नहीं की अपितु मानव मात्र के कल्याण और ज्ञान वर्धन के लिए की ताकि हम निष्पक्ष होकर सत्य और असत्य का अन्तर जान सकें और असत्य मार्ग को छोड़कर सत्य मार्ग की ओर बढ़ सकें क्योंकि उनका मानना था कि दुःख का कारण असत्य और अज्ञान है अतः सुख की प्राप्ति के सत्य मार्ग को जानने का प्रयत्न प्रत्येक मनुष्य को करना चाहिए ।

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  • इस ग्रन्थ के सम्बन्ध में पाँच वर्ष तक ऋषि जीवन की विशेष सामग्री एकत्र करने के प्रयोजन से मैंने विशेष पर्यटन किया। उस यात्रा में जहाँ मुझे महाराज के उत्तमोत्तम वृत्त प्राप्त हुए वहाँ अतिशय वृद्ध ऋषि-भक्तों के चित्तादर्श में उनकी मनोहर छवि देखने का भी सौभाग्य उपलब्ध हुआ। इस भूरि परिभ्रमण से मेरे पास महाराज के जीवन समाचारों की कई टिप्पणी-पत्रिकायें हो गई। मुख्य दो कारणों से मैने दो वर्ष पहले लेखनी अवलम्बन की एक तो सज्जन स्नेही पुनः पुनः प्रेरणा करते थे कि टिप्पणी-पत्रिकाओं को पुस्तकाकार कर देना उचित है। इनके खो जाने का भी भय है। आजकल करते कार्य रह भी जाया करते हैं। मुझे अपनी टिप्पणियों को यथासम्भव शीर्ष ग्रन्थन कर देना चाहिये। दूसरे, काशी कई दिनों तक रहकर स्व. देवेन्द्रनाथ द्वारा संग्रह की गई ऋषि जीवन की सामग्री को भी देखा। उनकी टिप्पणी-पत्रिकाओं को सुना। इसमें आर्य्य पथिक श्री प० लेखराम जी की सामग्री से बड़ा भारी भाग लिया है। स्वामी सत्यानन्द

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  • इस ग्रन्थ के सम्बन्ध में पाँच वर्ष तक ऋषि जीवन की विशेष सामग्री एकत्र करने के प्रयोजन से मैंने विशेष पर्यटन किया। उस यात्रा में जहाँ मुझे महाराज के उत्तमोत्तम वृत्त प्राप्त हुए वहाँ अतिशय वृद्ध ऋषि-भक्तों के चित्तादर्श में उनकी मनोहर छवि देखने का भी सौभाग्य उपलब्ध हुआ। इस भूरि परिभ्रमण से मेरे पास महाराज के जीवन समाचारों की कई टिप्पणी-पत्रिकायें हो गई। मुख्य दो कारणों से मैने दो वर्ष पहले लेखनी अवलम्बन की एक तो सज्जन स्नेही पुनः पुनः प्रेरणा करते थे कि टिप्पणी-पत्रिकाओं को पुस्तकाकार कर देना उचित है। इनके खो जाने का भी भय है। आजकल करते कार्य रह भी जाया करते हैं। मुझे अपनी टिप्पणियों को यथासम्भव शीर्ष ग्रन्थन कर देना चाहिये। दूसरे, काशी कई दिनों तक रहकर स्व. देवेन्द्रनाथ द्वारा संग्रह की गई ऋषि जीवन की सामग्री को भी देखा। उनकी टिप्पणी-पत्रिकाओं को सुना। इसमें आर्य्य पथिक श्री प० लेखराम जी की सामग्री से बड़ा भारी भाग लिया है। स्वामी सत्यानन्द

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  • Satyarth Prakash (Light of Truth) deals with the docttrines of the Sanatan Vedic Dharma and philosophy. It also consists of critical examination of different religions and sectorian beliefs. This Book as translation of Satyarth Prakash into English is unique in several aspects. As most of the Vedic terms and Samskrita words do not have their equivalent in the English vocabulary, the translator has very carefully chosen the English words which convey the correct and right meaning of the terms to a greater range in this translation. Besides, being a scholar of Samskrita and science, his insight into the Veda mantras, Slokas and other Samskrita aphorisms is remarkable. He has thus made this translation easily understable and to the point both for the Indians who are familiar with the Vedic and Samskrita terms and also for the English speaking people who are eager to have a clear understanding of the ancient and oldest Sanatana Vedic Dharma, culture and history of the Āryas. This translation is indeed a must read for missionaries, students of comparative religions, and for the seekers of truth.

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  • वैदिक धर्म महान् है, वैदिक संस्कृति महान् है, वैदिक सभ्यता महान् है, वैदिक रीति-नीति और इतिहास महान् है । प्राचीन ऋषियों, मनीषियों, कवियों ने इन वैदिक सिद्धान्तों को संस्कृत भाषा के श्लोकों में बहुत ही आकर्षक, सरस तथा यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया है । इन श्लोकों की एक – एक पंक्ति से निकलने वाला संदेश मनुष्य के कानों को बींधकर, मन को भेदकर हृदय पर बने हुए जन्म-जन्मान्तर के अज्ञान के संस्कारों को उखाड़कर जीवन में नई प्रेरणा, नये उत्साह तथा नई उमंग को उत्पन्न करता है । पतित, घृणित, निराश, निम्नस्तर का जीवन भी परिवर्तित होकर महान्, आदर्श, श्रद्धेय तथा अनुकरणीय बन जाता है ।

    संस्कृत भाषा सर्वाधिक प्राचीन व वैज्ञानिक भाषा है और सभी भाषाओं की जननी है। इतना ही नहीं यह अति सरल तथा सुव्यवस्थित है । सामान्य मनुष्य इसको थोड़े ही समय में लिखना, पढ़ना, बोलना सीख लेता है । उससे भी बढ़कर विशेषता यह है कि प्राचीन सत्य सनातन वैदिक धर्म के मूल ग्रन्थ वेद, दर्शन, ‘उपनिषद्, गीता, रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृतियाँ आदि संस्कृत भाषा में ही लिखे हुवे हैं । इन ग्रन्थों में लिखे मन्त्रों, श्लोकों, सूत्रों के भाव अत्यधिक महान् है । इनके अर्थों को जानकर मन में आनन्द, उत्साह, उमंग, आशा उत्पन्न होती है तथा हताश – निराश, अकर्मण्य निम्नस्तर का मनुष्य तत्काल नई प्रेरणा, ऊर्जा प्राप्त करके जीवन को महान् ऊँचाईयों तक ले जा सकता है ।

    आश्रम में चलने वाले आर्ष गुरुकुल के आचार्य स्वामी मुक्तानन्द जी ने इस पुस्तिका के सम्पादन में पुरुषार्थ किया, सुझाव दिया तथा संशोधन किया है। मैं उनके प्रति कृतज्ञ । ऋषि-मुनियों की ये कृतियाँ जीवन में हमें कर्तव्य- अकर्तव्य का सरस- सुन्दर – स्पष्ट बोध कराती हैं । – आओ ! हम भी पवित्र आत्माओं की प्रेरक वाणी को पढ़कर

    अपने जीवन को महान् तथा आदर्श बनावें ।

    प्रकाशकीय

    आचार्य ज्ञानेश्वरजी आर्य ने ‘विवेक वैराग्य श्लोक संग्रह’ के दो भागों का प्रकाशन कराया था । बहुत समय से दोनों का सम्मिलित एक रूप प्रकाशन करने का निवेदन आ रहा था । इस भावना को ध्यान में रख कर यह प्रकाशन किया जा रहा है । इसे शुद्ध रूप में प्रकाशित करने में ब्रह्मचारी शिवनाथ आर्य ने बहुत पुरुषार्थ किया । स्वामी मुक्तानन्द जी का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। मैं दोनों का धन्यवाद व आभार व्यक्त करता हूँ । दोनों के प्रति शुभकामनाएँ । आशा हैं यह प्रकाशन उपयोगी सिद्ध होगा ।

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