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Dharam Tatha Samajwaad धर्म तथा समाजवाद

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मानसिक दासता का यह लक्षण है कि व्यक्ति अपने स्वामी के गुणगान करने लगता है । शारीरिक दासता और मानसिक दासता में अन्तर होता है। शरीर से दास व्यक्ति मालिक की आज्ञा का पालन तो करता है, परन्तु वह उसको श्रेष्ठ नहीं समझता ।

यह अवस्था प्रायः हिन्दुओं की मुसलमानी राज्य में रही । हिन्दू मुसलमान नबाबों और बादशाहों की नौकरी करते थे, परन्तु वे उनको कभी भी अपने से श्रेष्ठ नहीं मानते थे। उनके शरीर तो दास थे, परन्तु मन स्वततंत्र थे और बुद्धि से अपने ज्ञान-विज्ञान को अपने आकाओं के ज्ञान-विज्ञान से श्रेष्ठ मानते थे । ।

यह स्थिति, अंग्रेजों के डेढ़ सौ वर्ष के राज्य से सर्वथा बदल गई । जहाँ इस्लामी राज्य के सात सौ वर्ष में हिन्दू शारीरिक दासता में रहते हुए भी मानसिक दृष्टि से स्वतन्त्र रहे थे, वहाँ डेढ़-दो सौ वर्ष के अंग्रेजी राज्य में. हिन्दुओं ने धीरे-धीरे शारीरिक स्वतन्त्रता तो प्राप्त कर ली, परन्तु मानसिक दासता में फँसते गये । सन् १७५७ से आरम्भ हुई शारीरिक दासता (Political dominance ) को सन् १९४७ में पार कर भारतवासी शरीर सें (Politically) स्वतन्त्र तो हो गए परन्तु इन्हीं दो सौ वर्षों में हम स्वाभिमानी और अपने धर्म एवं ज्ञान-विज्ञान में निष्ठा रखने वाले न रहूकर, अपने भाषा-भाव, वेश-भूषा में योरोप के दास बन गये ।

यह चमत्कार जो मुसलमान सात सौ वर्षों में नहीं कर सके

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