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Kahan gaye woh log कहाँ गये वो लोग

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कहाँ गए वो लोग :

यह पुस्तक क्यों ?

दुनिया सदा एक जैसी नहीं रहती, इसमें उन्नति- अवनति, ह्रास और विकास चलता रहता है। यह सम्भव है कि सृष्टि के प्रारम्भ में शुद्ध, धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों में की संख्या ज्यादा रही हो और बुरे कहे जाने वाले लोग ना के बराबर रहे हों और शायद इसीलिये उस सतयुग के नाम से लोगों के मन में अलौकिकता और उस समय के लोगों की गणना भगवान् के रूप में करने की भावना ने जन्म लिया हो । तब जो भी रहा हो, पर आज ऐसी स्थिति बिल्कुल नहीं है। आज दूसरे का छीनने की प्रवृत्ति इतना विकराल रूप ले चुकी है कि धर्म और नैतिकता सिखाने का दावा करने वाले व्यक्ति और संगठन भी प्रायः इसी लूट की भावना पर चलते हैं । जब कोई चीज बहुत दुर्लभ हो जाये तो उसकी माँग बढ़ जाती है और माँग के साथउसकी कीमत भी। व्यक्ति उसके लिये कोई भी कीमत चुकाने को तैयार होता है। आज के धार्मिक गुरु और संगठन मनुष्य की इस कमजोरी का पूरा फायदा उठाते हैं। ऐसे में अगर कोई वास्तव में धर्म, नैतिकता व आदर्शों की तुला पर खरा उतर जाये तब वह संसार की अमूल्य धरोहर बन जाता है, उसके विचार, उसके शब्द, उसके जीवन की एक-एक घटना को सुरक्षित रखना और लोगों तक पहुँचाना प्राथमिकता की श्रेणी में आ जाता है। बस इसीलिये डॉ. धर्मवीर जी के लिखे वाक्य आप तक पहुँचाने की इतनी अधिक उत्कण्ठा है।

– धर्मवीर क्या हैं, उनका मूल्यांकन करने में हम शायद कंजूसी बरत रहे हैं ऐसा मुझे लगता है। विद्वान्, त्यागी, तपस्वी, नेता, वक्ता, लेखक जैसी सीमाओं में बाँधकर उन्हें नहीं परखा जा सकता और न ही उनसे लाभ लिया जा सकता है। अमृत को मात्र पानी समझकर उससे नहाया जाये, तो कुछ शारीरिक मलिनता भले ही दूर हो सकती है, पर हजारों, लाखों प्राणियों को मिलने वाले अमरत्व की बलि देकर । उसी तरह धर्मवीर और उनके विचारों को छोटी सीमाओं से मुक्त कर देखें तो शायद जीवनोपयोगी रत्न हमारी झोली में भी गिर जाएँ। ऐसा हम क्यों कह रहे हैं? इसके लिये कुछ पीछे चलते हैं ।

जिस समय दयानन्द ने पहले-पहल मन में संसार के प्रति उठी विरक्ति को अनुभव किया, उस समय उनके मन में किसी संगठन बनाने, प्रचार-प्रसार करने की कल्पना भी नहीं थी । जब वे भटकते-भटकते गुरु विरजानन्द के पास पहुँचे तो उन्होंने अपनी और दुनिया की समस्याओं का समाधान वेद और ऋषियों के ग्रन्थों में पाया । उस समाधान को उन्होंने केवल मात्र पढ़ा नहीं, बल्कि जीया, उसे खुद पर प्रयोग किया और जब यह प्रयोग सफल रहा तो इसे समाज में बाँटने की योजना बनाई, इसी योजना को आज हम आर्यसमाज के नाम से जानते हैं । दयानन्द का उद्देश्य बिलकुल सीधा और साफ है, उन्हें आर्यसमाज इसलिये प्यारा है क्योंकि वह वेद की विचारधारा को जन-जन तक पहुँचा सकता है और वेद भी इसलिये पसन्द है, क्योंकि वही संसार के प्राणियों को सुख की ओर ले जाता है । दयानन्द के लिये देश, व्यक्ति, शास्त्र, भाषा, संस्कृति, विचार सब माध्यम हैं-सबकी उन्नति का, हर प्राणी का सुख ही उनकी अन्तिम सीमा है। दयानन्द हर उस वस्तु के पक्षपाती हैं, जो दुनिया को दु:खों से हटाकर सुख की तरफ ले जाती है और शायद भगवान् भी इसीलिये प्रिय है, क्योंकि उसके पास हर समस्या, हर दुःख का अन्तिम समाधान है। दयानन्द यदि किसी विचार या परम्परा का बहुत कठोरता से खण्डन करते हैं, तो समझिये कि वह विचार मानव समाज के लिए उतना ही हानिकारक है। इसलिए दयानन्द उतने ही निर्दयी हैं, जितना वह चिकित्सक, जो अपने रोगी को जानलेवा रोग से छुड़ाने लिए उसके शरीर को काटने में भी नहीं हिचकिचाता। बाहर से भले ही क्रूरता दिखाई दे, परन्तु हृदय में कल्याण की भावना ही मूल में होती है।

दयानन्द के बाद इस जनकल्याण के उद्देश्य को उनके अनुयायियों ने जीवित रखा। उनके लिये सत्य, न्याय, उचित जैसे शब्द ही मुख्य थे, बाकि सब तो मात्र साधन था, गौण था। लेकिन आज …? आज भी आर्यसमाज संगठन है, विचार हैं, शास्त्र भी हैं, भाषा, परम्परा, संस्कृति सब कुछ है- पर मूल भावना और ध्येय ओझल से दिखाई देते हैं । हो भी कैसे? जिसने मिठाई का स्वाद स्वयं चखा हो वही उसे औरों को बाँटने के लिये लालायित रहता है, यह बताने के लिये कि तू भी चख ! और देख कितनी मिठास है, कितना आनन्द है, कितना सुख है । जिसने खुद नहीं चखा, देता तो वह भी है पर वह बस दुकानदारी करता है । यह आनन्द को बाँटने की भावना, तड़प स्वयं प्रयोग किये बिना नहीं आ सकती ।

वर्तमान में धर्म के, वेद के इसी प्रयोग का नाम धर्मवीर है। धर्मवीर को धर्म संस्कृति, वेद, दयानन्द, ईश्वर बहुत प्रिय हैं और वे उत्कण्ठित हैं इसे सबमें बाँटने के लिये, क्योंकि उन्होंने धर्म को जीया है, वेद को व्यवहार में प्रयोग किया है । दयानन्द को अपनी जीवन शैली का आदर्श बनाकर देखा है, फिर उससे जो आनन्द, जो निर्भयता, जो सन्तोष मिला वह और भी लें – यही उनकी इच्छा है ।
इसलिये विद्वान्, नेता, वक्ता, लेखक जैसे शब्द उनकी सीमा में एक साधन मात्र हैं, उनकी वास्तवकि सीमा तो सम्पूर्ण मानवता है, इसलिये वे इन सबसे ऊपर सन्त की श्रेणी में आ जाते हैं। ऐसा सन्त जो सजग है, अनुचित को सहन नहीं करता। धर्मवीर प्रहरी है, वह कलम की कृपाण लेकर हमेशा आँख खोलकर बैठा रहता है। यह कलम ही उनका मुख है, जिससे वे अमृततुल्य विचारों को प्रवाहित करते हैं। उनकी कलम वज्र की भाँति है, जिससे उन्होंने सत्य के प्रकाश पर पड़े अविद्या के बादलों को छिन्न-भिन्न कर मानवता को पुनः प्रकाशमय किया ।

संगठन में प्राय: तीन तरह के लोग होते हैं, एक- जो उस संगठन में निजी स्वार्थों की पूर्ति देखते हैं। दूसरे- वे जिन्हें संगठन का विचार अच्छा तो लगता है, किन्तु इसलिए क्योंकि उन्हें वही सिखाया गया है। कुछ और बताया गया होता तो आज उसे मान रहे होते । तीसरे वे लोग होते हैं जो संगठन के विचारों में व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और पूरे विश्व का कल्याण देखते हैं और उसके बाद उस विचार को क्रियान्वित करने के लिए अपना पूरा जीवन लगा देते हैं। धर्मवीर इसी तीसरी पंक्ति में आते हैं और आज धर्मवीर के बाद यह पंक्ति खाली दिखाई देती है।

धर्मवीर सत्य के जितने बड़े उपासक हैं, असत्य के उतने ही बड़े शत्रु भी । जो व्यक्ति, जो घटना, जो व्यवहार उन्हें उचित की कसौटी पर खरा लगा, उसे हृदय की अन्तिम गहराई से समर्थन का स्वर दिया, परन्तु जो अनुचित लगा उस पर प्रहार करने में तनिक भी देर नहीं लगाई । इस कार्य में इस बात को कतई महत्त्व नहीं दिया कि सामने कोई परिचित है या अपरिचित, मेरा प्रशंसक है या निन्दक, सहयोगी है या विरोधी, जो लिखा बस सच के लिये लिखा ।

उन्होंने अपनी सीमाओं के अनुरूप ही ऋषि दयानन्द, आर्यसमाज और वेद के विचारों को ऊँची उड़ान दी । जो भी बात कही, वैश्विक स्तर पर कही, क्योंकि वेद और दयानन्द पूरे विश्व के काम की चीज है, इसलिये आर्यजगत् के मानस पर वे एक अघोषित नेता के रूप में सदैव प्रतिष्ठित रहे ।

पाठक ! सत्य के अनुरागी, यह दयानन्द के उपासक डॉ. धर्मवीर के लिखे विचार आपको अर्पित करते हुए मन में कितनी उमंग और उत्साह है, यह केवल स्वानुभूति का विषय है । इस लेखमाला को पुस्तक रूप देने में डॉ. साहब की धर्मपत्नी श्रीमती ज्योत्स्ना जी का परिश्रम अनुकरणीय है। सभा के अन्य कार्यों एवं इस पुस्तक के अतिरिक्त अन्य पाँच पुस्तकों का संशोधन व सम्पादन एक साथ करना सभा के प्रति समर्पण का परिचायक है । इन सब लेखों को संगृहीत कर इस कार्य की आधारशिला रखने के लिए श्री सोमेश पाठक धन्यवाद के पात्र हैं। इस पुस्तक में पुस्तक के नाम के अनुरूप ही व्यक्तिपरक लेखों को प्रमुखता से रखा गया है। उनकी यह लेखमाला अलग-अलग अवसरों पर खिले फूलों का संग्रह है। वे उस व्यक्ति पर लिखते हुए विचार और चिन्तन के जिस शिखर पर पहुँच जाते हैं, बस वही शिखर इस पुस्तक का ध्येय है। विचार शाश्वत हैं, नित्य हैं, वही जीवन-निर्माता भी हैं, अत: उन विचारों को आप जी-भरकर लूटें, यही कामना है।

उस महात्मा के व्यक्तित्व का एक तुच्छ उपासक
प्रभाकर

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