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Yajurveda-Shatakam यजुर्वेद शतकम

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वेद वैदिक संस्कृति के आधार स्तंभ है, वेद प्रभु प्रदत वह ज्ञान है, जो सृष्टि के आदि में मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और चारित्रिक उन्नति के पथ प्रदर्शन के लिए मिला था, यह ज्ञान चार ऋषीयों को मिला था, ज्ञानस्वरूप प्रभु ने यजुर्वेद का प्रकाश वायु ऋषि के ह्रदय में किया था याजिक प्रक्रिया में यजुर्वेद का प्रमुख एवं महत्वपूर्ण स्थान है अतः इसे यजुर्वेद भी कहते हैं यज्ञ का एक नाम अध्वर भी है, अतः इसे अध्वर्वेद भी कहते हैं, चारों वेदों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं, उन्हीं के अनुसार यजुर्वेद कर्मकांड प्रधान है, यजुर्वेद कर्म वेद है, पहले ही मंत्र में श्रेष्ठतम कर्मों को करने का आदेश दिया गया है, अंत में भी कर्म करने पर बल दिया गया है, मनुष्य को चाहिए कि वह इस संसार में 100 वर्ष तक कर्म करते हुए जीने की इच्छा करें ,यजुर्वेद यज्ञवेद है और कर्मकांड प्रधान है परंतु यज्ञ का अर्थ संकुचित न होकर बहुत व्यापक है प्रत्येक परोपकार का कर्म यज्ञ है यजुर्वेद में धर्म नीति, समाजनीति, राजनीति, अर्थनीति, शिल्प कला कौशल तथा मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत सभी कर्मों का वर्णन है, अध्यात्म ज्ञान के गूढ़ तत्व भी इसमें स्थान स्थान पर मिलते हैं, इसका 40 वा अध्याय तो सारे का सारा ही आध्यात्मिक तत्वों से परिपूर्ण है, यह अध्यात्म ईशोपनिषद के नाम से प्रसिद्ध है, जिस पर समस्त संसार मोहित है, प्राचीन काल में यजुर्वेद की 101 शाखाएं थी इन शाखाओं के भी दो प्रधान वर्ग है एक शुक्ल और दूसरा कृष्ण, शुक्ल यजुर्वेद की 15 शाखायें थी और कृष्ण यजुर्वेद की 81 शुक्ल यजुर्वेद का ब्राहमण शतपथ और उपवेद धनुर्वेद है,
यजुर्वेद की अध्याय संख्या 40 और मंत्रों की संख्या 1975 है, महर्षि दयानंद ने शुक्ल यजुर्वेद पर अपना भाष्य लिखा है ,महर्षि दयानंद का भाष्य अपूर्व एवं अनूठा है उव्वट और महीधर के भाष्य इतने अश्लील है कि उन्हें सभ्य समाज के समक्ष बैठकर पढ़ा नहीं जा सकता, इसके विपरीत महर्षि दयानन्द का भाष्य इस अश्लीलता से सर्वथा रहित है महर्षि दयानंद का भाष्य वैदिक सत्य सिद्धन्तों का प्रतिपादन तथा मनुष्यों के दैनिक कर्तव्यों का संदेश व उपदेश देता है, इस पुस्तक में महर्षि के भाष्य से 100 मन्त्र दिये गये हैं इसमें भी प्रत्येक मंत्र का एक शीर्षक दे दिया है जिसमें मन्त्र समझने की सुविधा हो, मंत्रों के अंत में जो संख्या दी गई है वह अध्याय और मंत्र की सूचक है, वेद का पढ़ना पढ़ना और सुनना सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है, आप भी अपने परम धर्म का पालन कीजिए प्रतिदिन वेद का स्वाध्याय कीजिए यदि अधिक नहीं हो तो एक मन्त्र अवश्य पढ़िए इस संग्रह को पढ़कर कुछ व्यक्तियों को भी मूल वेद पढ़ने की प्रेरणा होगी तो हम अपने परिश्रम को सफल समझेंगे

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Description

Veda Vedic culture is the pillar of the Vedic Vedic culture. It is the life which was found in the creation of the physical and social progress of the human being in the creation of the path of spiritual progress; It was found that four things were found. Lord Krishna started the light of the Yajurveda In the heart, or in the process of victory, Yajurveda is the principal and important place, hence it is also called Yajurveda. It is also known as Anwar of Jai. According to Atharvaveda also, the four Vedas have their own characteristics, according to them, Yajurveda is the ritualistic master. Yajurveda is the verse Vedas. It has already been ordered to do system work by earning the best for achieving mantra Savita. In the end, Given that Kurbaan has done this, the person should apologize for commerce. He wants to live in this world for 100 years while doing his work. The Yajurveda and ritualistic are the main, but the meaning of the judge is very narrow and is very comprehensive. The karmic yajna of every charity is in Yajurveda. Dharma Policy Politics Politics The art of art is the art skill and the description of all the deeds from the birth of man to the death is the attribute of spirituality Even in the place of place it is found in its 40th chapter, all of them are filled with spiritual elements. I am famous as the Upanishad, on which all the world is fascinated, there were 101 branches of Yajurveda in ancient times. These branches also have two principal sects; One is the formula and the other was of Krishna Shukla Yajurveda and Krishna’s 81 Shukla Yajurveda and Dhuruvad is Yajurveda chapter number 40 and Mantra number 1975. Maharishi Dayanand has Shukla Yajurved Dayanand and it is inevitable that they can not be read in front of society and can not be read. The rendering of Dayanand principles was coming from the direction of the message of human beings, it is being published in it if given a title of each mantra which will facilitate understanding of the mandar, the number of chants given at the end of the chants, chapters and mantras It is an indicator of reading the reading of the Vedas and reciting it. The ultimate religion of the questions is to follow your ultimate religion. Do the work of daily discrimination if not more Micro Must Read some people reading this collection also was inspired by reading the original Veda I managed my labor would consider owner Jagdishhwaranand Muse.

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Weight 100 g

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